वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है
सौ झूठ बोलते
दिव्य दर्शन सच के हो जाना
सुना आज बहुत आम है
कहीं कितने भी हों विलाप भक्तो
मूल्यों का आलाप जरूरी सुबहो शाम है
सही की परिभाषा गढ़ रहा है नई कोई
समझा करो बहुत ही विद्वान है
गिरोह से प्रेम रखता है तो क्या
गिरोह के कत्लेआम में ही तो सम्मान है
बतला रहा है
टांग पर खड़ा है एक बरसों से
क्या हुआ अगर हम्माम है
कपड़े खुद के उतरे हुए हैं सारे सभी
आईने में तो दिख रहा सब गुलफाम है
किसलिए करें बात शर्म करने की
लाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है
‘उलूक’ गिनना मोतियाबिंद सोच पर पड़े
और बिखरे हुए कागजों पर
एक बड़ा काम है
किसको देखनी है अब रोशनी सुबह की भगत
अंधेरे का ही बस करना जब गुणगान है?
चित्र साभार: https://pixabay.com/

मगर कलम की स्याही आजकल जाम है
जवाब देंहटाएंसारा वक्त सोचने में चला जाता है
आभार
वंदन
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 17 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंअंधेरे का ही गुणगान है
जवाब देंहटाएंयही हो रहा और यही सच है
और फिर कडवा सच:-
लाशों की ढेर पर ठहाके
किसलिए करें बात शर्म करने की
जवाब देंहटाएंलाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है
बेहतरीन रचना 🙏 सादर प्रणाम गुरुजी
गहरा कटाक्ष, वाक़ई यह समय बहुत अजीब सा है, क्या असली है क्या नक़ली फ़र्क़ करना कठिन हो गया है, अंधेरा ही अंधेरा जब सामने हो तो लोग रोशनी को भूल ही जाते हैं, हरेक सजग व्यक्ति को अपना दीपक ख़ुद ही जलाना होगा
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